<no title>उत्तराखण्ड: धार्मिक-पर्यटन

उत्तराखण्ड अपनी अनुपम छटा के लिए पहले से ही सुविख्यात रहा है, यहां के पर्वत, बुग्याल, झरने, झीले और मंदिर हमेशा से ही पर्यटकों के मन में कौतुहल उत्पन्न करते है, हर साल लाखों की संख्या में यहां पर्यटक चारधाम की यात्राओं के अतिरिक्त नैनीताल, मसूरी, औली, मुनस्यारी, भीमताल, रानीखेत जैसे सुरम्य स्थानों की अनुपम छटा का आनन्द उठाने भी आते है, मौजूदा समय में इन छोटे-बड़े सभी पर्यटक स्थलों को विकसित करने की आवश्यकता है जिससे पर्यटन के माध्यम से स्थानीय जनता के आर्थिक विकास में एक कदम और बढ़ाया जा सके....


ऋषि मुनियों की तपोस्थली उत्तराखण्ड देव भूमि के नाम से विख्यात व हिमालय पर्वतों को गोद में बसा प्रदेश अपने में अनगिनत धर्मों, रीति-रिवाजों तीर्थ-स्थालों, प्राकृतिक सौन्दर्य, पीठों, शिल्प कलाओं, ग्लेशियरों व साहसिक स्थलों को समेटे है। जहां पर्यटन के क्षेत्र में रोजगार की अपार संभावनाओं के साथ प्रदेश में आमदनी के मुख्य स्रोत है, साथ ही यहां का प्राकृतिक सौन्दर्य की छटा दूर-दूर बिखरी है। जिसमें मन प्रफुल्लित व आत्मा की शांति मिलती है। उत्तराखण्ड में अनगिनत देवालय भी है जिनमें देवताओं की महिमा यहां बसे लोगों पर अपार कृपा बरसाती है। यहां के इतिहास के छठी शताब्दी से लेकर बारहवीं शताब्दी तक के युग को धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से तीर्थों का युग कहा जाता है। तांडव नृत्य से कंपा देने वाले त्रिशुलधारी भोले नाथ की महिमा उत्तराखण्ड के चप्पे चप्पे से हमेशा सुनाई देती है। उत्तराखण्ड के अनगिनत मन्दिरों का संक्षिप्त विवरण कुछ इस तरह शुशोभित होता है जो कि प्रमुख धामों व देवालयों के सम्बन्ध में पत्र-पत्रिकाओं मं व्यापक रूप से प्रकाशित हो चुके हैं।
हरिद्वार
शिवालिक की पहाड़ियों के चरणों और बिल्व व नील पर्वतों के मध्य पतीत पावनी गंगा की निर्मल धारा के किनारे समुद्रतट से 295 मीटर के ऊचाई पर स्थित हरिद्वार प्राचीन काल से ही गृहस्थों संत, महात्माओं, पर्यटकों ओर तीर्थ यात्रियों को अपनी ओर आर्कषित करता है।
ऋषिकेश
ऋषिकेश के कुब्जाम्रक क्षेत्र भी कहा जाता है यहां रैम्य ऋषि को भगवान विष्णु की तपस्या की थी, उनके कुबडे होने से ऋषि का पुराना नाम कुब्जाम्रक था।
युमनोत्री धाम
यमनोत्री धाम यमुना नदी का उद्गम स्थल है यहां यमुना देवा का प्रसिद्ध मन्दिर है जिसको यमुनोत्री धाम से जाना जाता है जहां पहुंचने के लिए जानकी चट्टी तक मोटरमार्ग तथा यहां से 5 किमी पैदल रास्ता तय करना पड़ता है, समुद्र तल से लगभग 3235 मीटर की ऊंचाई पर मन्दिर स्थित है, मन्दिर के समीप गरम पानी का तप्त कुण्ड है जिसे सूर्य कुण्ड के नाम से भी जाना जाता है जिसमें यात्री कपड़े में चावल एवं आलू पकाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण करते है।
गंगोत्री धाम
गंगोत्री राजा भागीरथ की तपस्थली है उद्गम से इसे भगीरथी नदी कहा जाता है जो संगम स्थल देवप्रयाग में आकर अलकनन्दा नदी से मिलकर गंगा कहलाती है। मां गंगा मन्दिर लगभग 3048 मी. ऊंचाई पर अवस्थिति है जिसका निर्माण 18 वीं सदी में हुआ। सफेद रंग की संगमरमर से बने इस मंदिर की ऊंचाई 25 फीट है, जहां गंगा का उद्गम स्थल गौमुख ग्लेशियर है जो गंगोत्री से 18 किमी. पैदल मार्ग को दूरी पर स्थित है। गंगोत्री तक सड़क मार्ग उपलब्ध है, मन्दिर के निकट अन्य पूजा स्थल सूर्य कुण्ड, विष्णु कुण्ड, ब्रह्मकुण्ड स्थित है। 
केदारनाथ
मंदाकिनी नदी के किनारे समुद्र तल से लगभग 3584 मी0 ऊंचाई पर स्थित यह मन्दिर 'शिव के धाम' नाम से विख्यात है। भगवान शिव के बारह ज्योतिलिंगों में से एक इस महाधाम में स्थित है जिनका जलाभिषेक गंगेत्री से लाये जल से किया जाता है। आदिगुरू शंकराचार्य ने इस पावन भूमि पर भगवान शिव मन्दिर स्थापित किया पौराणिक कथानुसार भगवान शिव ने इसी स्थान पर पाडवों को कौरवों की हत्यागत पाप से मुक्त किया था। केदारनाथ में अनेकों कुंड विद्यमान है जिनका अपना आध्यात्मिक महत्व है, केदारनाथ धाम हेतु सोनप्रयाग तक बड़े वाहनों तदोपरांत सोनप्रयाग से 5 कि.मी. गौरीकुण्ड तक छोटे वाहनों से पहुंचा जा सकता है। इसके आगे 16 किमी. पैदल वाया चिलचैली तक तय की जाती है इस दूरी को घोडे/खच्चर/डांडी/कांडी आदि से भी तय किया जा सकता है।
श्री बद्रीनाथ मन्दिर
अलकनन्दा नदी के दाहिने तट पर 3133 मी. की ऊंचाई पर नर व नारायण पर्वत की गोद में 'बद्रीवन' स्थित श्री बद्रीनाथ धाम ;काले पत्थर की ध्यान मग्न पद्मासन भगवान विष्णु की मूर्तिद्ध हिन्दुओं के सबसे पुराने तीर्थ स्थलों में से एक है। 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य द्वारा इस मन्दिर की स्थापना की गई। भगवान के पुजारी दक्षिण भारत के नम्बूदरी पाद्ब्राह्ममण ;रावलद्ध होते है। श्री बद्रीनाथ मन्दिर के अतिरिक्त यहां पर तत्पकुण्ड, नारदकुण्ड, शेषनेत्र, नीलकंठ शेखर, उर्वशी मंदिर, ब्रह्मकपाल, मातामूर्ति मन्दिर, देश का अंतिम गांव माना, भीमपुल, वसुधारा जल प्रताप आदि स्थल दर्शनीय है।
हेमकुण्ड साहिब
अलकनंदा एवं पुष्पावती के संगम में 4329मी. की ऊंचाई पर हेमकुण्ड साहिब गुरूद्वारा स्थित है। गुरु ग्रन्थ साहिब के अनुसार इस स्थान पर सिक्खों के दसवें गुरु गोविन्द सिंह जी के द्वारा तपस्या की गई थी। हेमकुण्ड साहिब के लिए गोविन्द घाट तक सड़क मार्ग द्वारा वाहनों से एवं तत्पश्चात 19 कि.मी. पैदल यात्रा कर पहुंचा जा सकता है।
देवप्रयाग
अलकनन्दा और भागीरथी के संगम पर बसा देवप्रयाग समुंद्र की सतह से 3266 फीट की ऊँचाई पर है यहां साक्षात देवताओं का वास बताया गया है। सतयुग में देवशर्मा नामक ब्राह्मण मुनि ने यहां अलकनन्दा तथा भागीरथी के संगम पर एक हजार वर्ष तक एक पैर पर खड़े रह कर भगवान विष्णु की तपस्या की थी।
रूद्रप्रयाग
केदारखण्ड पुराण में कोल पर्वत से लेकर मंदाकिनी-अलकनंदा संगम तक के क्षेत्र किया गया है। महाभारत के एक उल्लेख से यह भी पता चलता है कि इसी तीर्थ को कभी रूद्रावर्त भी कहा जाता था।
कर्णप्रयाग
यह पिंडर तथा अलकनंदा का संगम है। यहां कर्ण ने सूर्य भगवान की तपस्या की थी जिससे प्रसन्न होकर उन्होंने कर्ण को उभेद्य कवच और अक्षत तूणीर दिये थे।
नन्दप्रयाग
यह भगवान श्री कृष्ण की गोप पूजा स्थल है केदारखण्ड पुराण के अनुसार नन्दाकिनी नदी को नन्दा कहते है। तिब्बत से सुहागा और शिलाजित आदि लाकर इसी मार्ग से कुमाऊँ और अन्य क्षेत्रों की मंडियों मंे जाता था।
विष्णुप्रयाग
ऐसा माना जाता है कि यहां भगवान विष्णु नृसिंह अवतार में समाधिस्त हुए थे यहां पर विष्णु कुण्ड, ब्रह्म कुण्ड, सूर्य कुण्ड, दुर्गा कुण्ड, धनदा कुण्ड आदि हैं।
पूर्णागिरी
टनकपुर से ठूलीगाड़ तक का सफर तय करने के उपरान्त 8 कि0मी0 की यात्रा के बाद पहाड़ की ऊंची चोटी पर पूर्णागिरी के दर्शन होते है। पूर्णागिरी में दर्शन और पूजा के बाद श्रद्वालु नेपाल में स्थित ब्रहादेव में बाबा सिद्वनाथ के दर्शन के लिए अवश्य जाते हैं।
गर्जिया देवी
नैनिताल में रामनगर से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर कोसी नदी के बीच एक टापू पर स्थित इस प्राचीन मंदिर की विशेष महत्ता है। जिस चट्टान पर यह मन्दिर है वह टीला कोसी नदी की बाढ़ में बह कर आया था।
नन्दा देवी
नन्दा देवी उत्तराखण्ड के प्राचीन कत्यूरी राजाओं की कुल देवी थी। अल्मोड़ा गजेटियर के अनुसार राजा बाज बहादुर चन्द्र जूनागढ़ वालों ने नन्दा देवी की मूर्ति को अल्मोड़ा के राम शिला के एक प्रंखड पर स्थापित किया था
कसार देवी
अल्मोडा के उत्तर में शहर से कि0मी0 की दूरी पर कश्यप पहाड़ी पर स्थित कसार देवी भारतीय ही नहीं विदेशियों का भी आर्कषण का केन्द्र है। पुराणों के अनुसार शुम्भ निशुम्भ नामक दैत्यों का नाश करने के लिए पार्वती यहां कौशिकी के रूप में प्रकट हुए थी।
दूनागिरी
दूनागिरी दूनागिरी वह क्षेत्र है जहां से लक्ष्मण के प्राण बचाने के लिए हनुमान जी संजीवनी बूटी ले गये थे। कहा जाता है कि संजीवनी की तलाश में आये हनुमान के प्रकाशवान पव्रत को देखकर जब संजीवनी बूटी को नहीं पहचान सके तो उन्होंने पहाड़ को ही ऊठा लिया था।
नयना देवी
1839 में अंग्रेज व्यापारी मि0 बैरन को नैनीताल को पता लगा था। ब्रिटिश शाशनकाल में अल्मोड़ा के व्यापारी लाला मोतीराम शाह नैनीताल आये उन्होंने सन् 1842 में नयना देवी मंदिर की स्थापना की।
कोटगाड़ी देवी
पिथौरागढ़ में स्थित कोटगाड़ी देवी अकारण लोगों के द्वारा सताये हुए लोगों के लिए यह साक्षत् न्याय की देवी है।
देवीधुरा का पाषाण युद्ध
चम्पावत जिले के एक मात्र स्थान है जहां श्रावण शुक्ल पक्ष के पूर्णमासी में पाषाण यु( होता है लोग एक दूसरे पर पत्थर बरसाते है।
काली मंदिर (गंगोलीहाटद)
कुमाऊँ अंचल की सरयु एवं रामगंगा के मध्य गंगावली की सुरम्य घाटी में स्थित भगवती के इस आराध्य स्थल पर मनवांछित फल की कामना करते हैं।
भ्रामरी देवी
पैराणिक कथा के अनुसार अरूण नामक दैत्य ने ब्रह्मजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर जब ब्रह्म ने उससे वर मांगने को कहा तो दैत्य ने ब्रह्मजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी।
वैष्णवी देवी
चन्द राजा द्वारा डीडीहाट के निकट आँकोट गाँव में बनवाये गये वैष्णवी देवी मन्दिर के कपाट वैशाख, श्रावण, कार्तिक तथा मा( के महिने में ही सर्वसाधारण के लिए खुलता है।
बाल सुन्दरी देवी
द्रोण सागर के निकट स्थित काशीपुर के पुराने किले का नाम उज्जैन होने के कारण इस देवी को उज्जैनी कहा जाता है प्रतिवर्ष चैत्र मास में यहाँ चैती का मेला लगता हैं।
झूला देवी
प्राचीन काल में शक्ति यहीं पर भूमि में दबी हुई थी। रानीखेत शहर के अस्तित्व में आने से पूर्व इस क्षेत्र पर जंगली जानवर विचरण करते थे।
चन्द्रबदनी
चन्द्रबदनी को भुवनेश्वरी पीठ कहा जाता है। टिहरी में चन्द्रकूट पर्वत पर आठ हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित इस पावन दिव्य और अलौकिक शक्तिपीठ में देवी की मूर्ति के बजाय श्रीयंत्र की पूजा होती हैं।
बागेश्वर
नील और भील पर्वतों के मध्य सरयू और गोमती के संगम पर ऐतिहासिक व पैराणिक शहर बागेश्वर हिन्दुओं का प्रमुख तीर्थ है। विद्वान लोग बागेश्वर को उत्तर की काशी मानते हैं। माना जाता है कि पाण्डवों ने कैलाश वक्त यहाँ पडाव डाल कर बागनाथ मंदिर की स्थापना की।
जागेश्वर
पृथ्वी पर पहला शिवलिंग जागेश्वर में ही प्रकट होना बताया गया है। जागेश्वर मंदिर भगवान शिव के समाधि में बैठे योगेश्वर रूप को दिखता है जो योगेश्वर से बिगड कर जागेश्वर हुआ।
बैजनाथ
बागेश्वर-अल्मोड़ा मोटर मार्ग में स्थित बैजनाथ में कामदेव के दमन के बाद पार्वती से विवाह के लिए जाते समय शिव ने यहाँ रूक कर विश्राम किया था।
पाताल भुवनेश्वर
गुफा मन्दिरों के लिए प्रसि(पाताल भुवनेश्वर वह स्थान है जहाँ 33 करोड़ देवी देवताओं का वास बताया जाता है। यह गुफा इन्द्र, दैत्य, गंधर्व नाग, नारद, सि( विद्याधर और अप्सराओं आदि का भी निवास स्थान माना जाता हैं।
दक्षेश्वर महादेव
हरिद्वार के निकट कनखल के दक्षेश्वर मन्दिर में स्यंभू शिवलिंग है। यहाँ निर्मित मंदिर का र्जीणोधार लण्ढौरा की रानी द्वारा कराया गया। जीर्णोधार लण्ढ़ौरा को रानी द्वारा कराया गया-साभार


ब्रह्मकमल पत्रिका