उत्तराखण्ड की लक्ष्मी बाई

त्तराखण्ड की वीर भूमि में समय-समय पर वीर सपूतों ने जन्म लिया है, और समय आने पर उसका प्रमाण भी दिया है। उत्तराखण्ड में वीरों की लम्बी फेहरिस्त है जिन्होंने अपनी मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की आहुति दी है, वीर चन्द्र सिंह गढवाली, माधों सिंह भण्डारी, श्री देव सुमन, विक्टोरिया क्राॅस विजेता गबर सिंह जैसे कई नाम शामिल हैं। इसी देवभूमि में अपने मातृभूूमि के लिए प्राण गवां देने वाली एक वीरांगना का जन्म हुआ था जिसका नाम था-''तीलू रौतेली''
22 वर्ष की अवस्था में कत्यूरी राजाओं के साथ युद्ध करते हुए अपनी मातृभूमि को कत्यूरी से आाजाद करवाया, थकी हारी यह वीरांगना जब वीरोखाल के निकट नदी में स्नान कर रही थी, तभी एक कत्यूरी सैनिक ने छलपूर्वक इनकी हत्या कर दी।


जब-जब वीरों की गौरव गाथाएंे जहन में आती है, तब-तब 64 के दशक की बहुचर्चित फिल्म 'नया दौर' में एक बहुत ही उम्दा गाना ''ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का, मस्तानों का'' उन वीरांे और वीरांगनाओं की याद दिला देता है जिन्होंने अपने देश व प्रदेश को अत्याचारियों से महफूज करने के लिए अपनी जान तक की परवाह नहीं की, ऐसी कई महान हस्तियां उनकी शहादत व हकीकत बयां करती है, बस आवश्यकता है उन्हें जानने व पहचानने की, क्योंकि कोई भी बलिदानी यह सोचकर बलिदान नहीं करता कि उनकी आने वाली पीढ़ियां उन्हें जाने-समझें, परन्तु उन वीरों के बलिदान ऐसे होते हैं कि समय की गर्द भी उनके नाम धुंधले नहीं कर सकती, और ये सब करने का जज्बा समय परिस्थिति के चलते किसी भी नर या नारी में उत्पन्न हो सकते है जो अपने समाज व देश, प्रदेश के भविष्य परिणामों के विषय में अपने मन से पीढ़ा रखने का साहस रखता हो, जो करोड़ों-लाखों में एक या दो ही उत्पन्न होते है। इन्हीं बलिदानों व समाज हित में एक बहुत बड़ा नाम उत्तराखण्ड के इतिहास में तीलू रौतेली का भी आता है, जिस वीरगंना ने 15 से 22 वर्ष की आयु तक निरन्तर और अन्तिम श्वांस तक युद्धरत रहकर अत्याचारियों के विरूद्ध युद्ध किया और अपने क्षेत्र से अत्याचारियों को भगा दिया, जिनकी जयन्ती 8 अगस्त को मनाई जाती है। उत्तराखण्ड के पौड़ी गढ़वल में चैंदकोट (बीरोखाल) की सत्रहवीं शताब्दी में इस वींरागना ने लगातार सात वर्षों तक युद्ध करके कत्यूरों वंश को अपने क्षेत्र से हराकर भगाया था, तत्वाश्चात युद्ध से फतह के पश्चात लौटते वक्ता जब वे रात्रि क समय स्नान करने लगी तभी धोखे से एक कत्यूूर सैनिक ने उनकी हत्याकर दी। कत्यूर कुमाऊ के राजा थे।?
कौन थी तीलू
इतिहास के अनुसार 9वीं शताब्दी तक कत्यूरी राजवंशी प्रभाव कुमाऊँ-गढ़वाल में चरम पर था। सन् 740 से 1000 ई0 तक उनकी राजधानी जोशीमठ फिर कार्तिकेयपुर (कत्यूर) तथा बाद मंे बागेश्वर रही। तीलू-रौतेली का जन्म भूप सिंह, गोर्ला और मैणावती रानी के घर सन् 1661 ई0 में गुराड गांव में हुआ था। तीलू के पिता गंगू गोर्ला ग्राम गुराड चैंदकोट के थोकदार थे। गंगू गोर्ला और मैणावती रानी के दो पुत्र भगतू और पत्र्वा तथा पुत्री थी तीलू। तीलू की सगाई बाल्यकाल में ही ईड गांव के सिपाही नेगी भवानी सिंह के साथ कर दी थी। बेला और देवकी की शादी तीलू के गांव गुरड में हुई थी, जो तीलू की हम उम्र थी, चैंद कोट में पति की बड़ी बहिन को रौतेली नाम से संबोधित किया जाता था, वीर भाईयों की छोटी बहिन तीलू बचपन से ही तलवार-ढ़ाल के साथ खेलकर बड़ी हुई, बचपन से ही तीलू ने अपने लिए सबसे सुन्दर घोड़ी 'बिंदुली' का चयन किया था।
कत्यूरों का आक्रमण
जब-जब गढ़वाल में फसल काटी जाती थी वैसे ही कुमाऊँ से कत्यूर सैनिक लूटपाट करने आ जाते थे, फसल के साथ-साथ ये अन्य सामान, भेड-बकरियां तक उठा ले जाते थे। ऐसे ही आक्रमण में तीलू के पिता व दोनो भाईयों के संग उनका मंगेतर भी शहीद हो गए, इस भारी क्षति से तीलू की मां मैणा देवी को बहुत दुःख हुआ, और उन्होंने तीलू को आदेश दिया कि वह नई सेना गठित करके कत्यूरों पर चढ़ाई करे, जिसके बाद तीलू ने एक फौज का गठन किया, तब उनकी उम्र महज 15 वर्ष थी, लगातार 7 वर्षों तक कत्यूरों पर बड़ी चतुराई से तीलू ने रणनीति बनाकर आक्रमण कर उनकी सेना का सर्वनाश कर दिया।
बेला व देवकी ने भी जो तीलू की हम उम्र व तीलू के गांव में उनकी शादी हुई थी इस कारण उन्होंने भी अपने अदम्य साहस से तीलू का साथ दिया व कत्यूरों से लडाई लड़ी। कुमाऊँ में जहां बेला शहीद हुई उस स्थान का नाम बेलाघाट और देवकी के शहीद स्थल को देघाट कहते है। अन्त में जब तीलू लड़ाई जीतकर अपने गांव गुराड़, वापस आ रही थी तो रात्रि को पूर्वी नयार में स्नान करते समय कत्यूर सैनिक रामू रजवाड़ ने धोखे से उनकी हत्या कर दी। ऐसी वीरांगना को शत्-शत् नमन।
ब्रह्मकमल