राजधानी की बेहाल सड़कें

    राजधानी किसी भी प्रदेश विकास का केन्द्र बिन्दु होती है, और विकास के केन्द्र बिन्दु में परिवहन व्यवस्था एवं अच्छी सड़कों का योगदान सबसे अधिक होता है। देहरादून की खस्ताहाल सडकों को देखकर तो आश्चर्य होता है, कि राजधानी में आप जिधर भी जिस सड़क पर जायें वहां आपको कहीं न कहीं गढ्ढे और उखडी डामर वाली सड़कें देखने को मिलेगी। प्रदेश के अन्य भागों से जब लोग राजधानी की कल्पना लेकर देहरादून पहुंचते हैं तब यही गढ्ढेदार सड़कें उनका स्वागत करती है। जब देहरादून से लोग अपने गांव लौटते होंगे तो राजधानी की सड़कों का ये हाल देखकर निश्चित ही दुखी होते होगें। जून में पौड़ी जनपद के धूमाकोट के तहसील में बस गिरने के कारण 48 लोगों की मृत्यु हो गयी थी जिस दुर्घटना का कारण सड़क पर बडा गढ्ढा और ओवर लोडिंग ही था।


जरा नीचे इन तस्वीरों को गौर से देखिए, ये गढ्ढेदार पानी से भरी हुई सड़के किसी गांव देहात या दूर दराज के पर्वतीय क्षेत्रों के नहीं है बल्कि ये राजधानी देहरादून के शहर की सड़के है। क्या इन सड़कों को देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ये राजधानी की सड़के हैं? ये तस्वीरें किसी एक जगह की नहीं बल्कि शहर भर की अलग-अलग जगह से ली गई है और अगर हम शहर भर से केवल गढ्ढेदार सड़कों की तस्वीरे लगाने बैठे शायद पूरी पत्रिका इन तस्वीरों से ही भर जाती। कुछ वीआईपी इलाके की सड़को छोड़कर बरसात में दून की सड़कों का यही बुरा हाल रहता है। घण्टाघर से रिस्पना पुल तक आपको एलआईसी बिल्डिंग, एसबीआई धर्मपुर, धर्मपुर सब्जीमण्डी से फव्वारा चैक तक, इधर घण्टाघर से प्रेम नगर जिस भी जाएं आपको सभी जगह सड़कों पर गढ्ढे ही गढ्ढे मिलेगें। इन गढ्ढों में पानी भरने के कारण गढ्ढे की गहराई का अंदाजा नहीं होता जिसका कारण दुपहिया वाहनों के दुर्घटनाग्रस्त होने की सबसे अधिक संभावना रहती है। दून वासियों का तो इन गढ्ढेदार सड़कों पर रोज की आवागमन होता है किन्तु दूर-दराज के लोग, राजधानी की ऐसी खराब सड़कों की हालत देखकर जरूर सकते हो सकते हैं 
राजनीति हमेशा अपना स्वार्थ तलाशती हैं, कोई भी सत्ताधारी दल अपनी पुरजोर कोशिश में लगा रहता है कि वह जनता की नजरों में अच्छा सुशासक बना रहे, फिर उसके लिए चाहे झूठ बोलना पडे, करोड़ों रूपये के विज्ञापनों के माध्यम से अपनी छवि को सुधारना पड़े, या कोई और भी नौंटकी करनी पड़े वह सब करते है, दिन रात एक दूसरे के ऊपर आरोप-प्रत्यारोप के छिछालेदर करने के बजाय अगर ध्यान सही रूप से जनहित के मुद्दों पर दिया जाये तो जनता स्वयं ही उनकी हो जायेगी, पर ऐसा करे कौन?
हमारी राजनैतिक व्यवस्था का शायद यह सबसे दुर्बल पहलू रहा है कि हर बार यहां जनता सेे झूठे वादे करों और उनको ऊंचे-2 सपने दिखाओं, अर्थशास्त्र में उस जीडीपी नाम की चिड़िया का भरपूर सहारा लो, उसके बाद प्रति व्यक्ति आय का आइना चमकाआंे, इन दोनांे शब्दों का जनता को दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं रहता, अगर किसी किसान, मजदूर या ठेला लगाने वाले से इन शब्दों के बारे में पूछा जाय या आम जनता से भी पूछा जाए तो निश्चित रूप से एक बड़े वर्ग को लगेगा ये कौन से शब्द हैं। और इन शब्दों का उनके जीवन में क्या महत्व है। जिन शब्दों में आर्थिक स्थिति तो बढ़ती हुई दिखाई देती है पर वास्तव में उसकी आमदानी और व्यय के बीच की वो लकीर कम नहीं होती। शायद यह अर्थशास्त्र की खूबी भी है कि व्यापक स्तर पर देश/राज्य की आर्थिक स्थिति को दर्शाने के लिए ये शब्द जितने सार्थक है, उतने ही आमजन को भ्रमति करने के लिए अच्छे शब्द भी।
प्रदेश में डबल इंजन की सरकार बनने के बाद प्रदेशवासियों में खुशी की लहर थी कि अब विकास भी दोगुनी रफ़तार से होगा और होना भी चाहिए, उम्मीद इसलिए भी ज्यादा थी क्योंकि अब केंद्र से मिलने वाले बजट और अन्य मांगों में अड़चन नहीं थी, किंतु डेड वर्ष के बाद भी हालात जस के तस है, आज भी प्रदेश लगभग 35 से 40 हजार करोड़ के कर्ज से दबा है, कई विभाग ऐसे है जहां से कर्मचारियों को नियमित रूप से वेतन नहीं मिल रहा है बेरोजगार सड़कों से लेकर सचिवालय तक आये दिन धरना प्रदर्शन करते रहते है, विभागों में  नई भर्तियां नहीं हो रही है, जहां परीक्षाऐं हुई भी है तो उनके भी रिजल्ट अटके हुए है या किसी अन्य तकनीकी कारणो से लम्बित हैं, अब ये बेरोजगार युवा करे तो क्या करे? क्योंकि सरकार तो चुनाव के समय रोजगार के सपने दिखाती है और बाद में युवाओं को स्वरोजगार की ओर प्रेरित करने की कोशिश करती है, खैर रोजगार की समस्या तो प्रत्येक सरकार के लिए हमेशा बड़ी समस्या बनकर ही रही है। आजकल वर्षा ऋतु का सीजन है, प्रत्येक वर्ष यह सीजन आता है, पूरे देश में इस समय बाढ़ अतिवृष्टि, भू-स्खलन, स़डकों का टूटना इत्यादि की घटनाऐं हो रही है, जिसमें काफी जगह जान-माल के नुकसान एवं मवेशियों के मारे जाने की भी खबरे लगातार आती ही रहती है।
हम फिलहाल अपने प्रदेश की बात करते है पर्वतीय भागों की सड़कों के हाल की तो बात क्या करें यहां तो राजधानी देहरादून की सड़कों का बुरा हाल है, देहरादून की एक आध वी.आई.पी. इलाके की सड़क को छोड़कर शहर में किसी भी जगह की सड़क ऐसी नहीं है जहां पर गढ्ढे न हो, यही गढ्ढे अक्सर दुर्घटनाओं का कारण बनते है, गौरतलब है कि गत वर्ष राजपुर रोड़ पर इसी प्रकार की एक गढ़ढे के कारण स्कूटी सवार दो महिलाओं की मृत्यु हो गई, तब मुख्यमंत्री ने पीडब्लूडी को तत्काल शहर भर के गढ्ढों को भरने का आदेश दिया था, सरकारें कोई भी आती-जाती रही प्रदेश में विकास के नाम पर बस गढ्ढे भरने तक का ही काम हुआ।
प्रत्येक वर्ष अप्रैल-मई में राजधानी की सड़कों की मरम्मत/डामरीकरण कराया जाता है, और प्रत्येक वर्ष एक डेड़ माह में न सड़कों पर गढ्ढे पड़ने लगते है फिर वाहनों की लगातार आवाजाही के कारण धीरे-धीरे यह गढ्ढे किनारे से टूटते जाते हैं और फिर बड़े गढ्ढे बन जाते है। 
अब यहीं से सवाल खड़ा होता है कि  प्रत्येक वर्ष अप्रैल-मई के दौरान शहर भर के सड़कों की मरम्मत/डामरीकरण किया जाता है जिस पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं तो क्या सड़के इतने हल्की और इतने घटिया स्तर के तकनीक पर बनाई जा रही है जो कि एक बरसात का सीजन भी न झेल पाये, क्या इनकी गुणवत्ता इतने हल्के स्तर की है जरा सोचिए जब राजधानी में सड़क निर्माण को लेकर ये हाल है तो प्रदेश के अन्य दूर-दराज इलाकों का क्या हश्र होगा, राजधानी में जहां कि सरकार और शासन के सभी उच्च अधिकारी/मौजूद है जो कि रोज इन्हीं सड़कांे पर सफर करते हैं लेकिन किसी का ध्यान इस ओर क्यूं नहीं जाता, हो सकता जाता तो अवश्य ही होगा, लेकिन उसके पीछे क्या बात हो सकती है? क्या निर्माणदायी संस्थाऐं इतने घटिया स्तर की सड़के बनाने के बाद भी कोई जिम्मेदारी नहीं लेती? इन निर्माणदायी संस्थाओं पर क्या सरकार कभी नकेल कस पायेगी? सरकार व शासन उनसे क्यों जबाब तलब नहीं करती? खराब सड़क बनाने वाले इंजीनियरों/ठेकेदारों पर क्यों कार्यवाहीं नहीं होती? एक इंजीनियर से जब खराब सडकों के बारे में जब मैंने पूछा तो उनका कहना था कि सड़कांे पर बरसात में पानी भर जाता है जिसके कारण डामर उखड़ जाती है और सड़कों पर गढ्ढे बन जाते है, जब मैंने पूछा कि गढ्ढे तो ढाल दार सड़कों पर भी है तो वह चुप हो गयें, आपको इस बात से समझ जाना चाहिए कि इसका सीधा अर्थ है गुणवत्ता मंें कमी होना। हर साल बरसात के सीजन में सड़कों पर यूं ही गढ्ढे बन जाते है लेकिन आज तक न तो कोई इ. पर कार्यवाही हुई और न ही ठेकेदार ब्लैक लिस्ट हुआ, इससे यह भी संदेश जाता है कि वो कुछ भी कर ले उनको बचाने वाले उनके आका उनके साथ खड़े है।
दूसरा सवाल यह भी है कि जो सरकार विकास कार्यों लिए जनता से टैक्स लेती है फिर उसका सद्पयोग क्यों नहीं किया जाता, जनता के टैक्स के पैसे से जो सड़के बन रही है वो कम से कम इतनी मजबूत तो बने कि आठ-दस साल टिक सके। ताकि अगली बार के पैसे को किसी और विकास कार्य में खर्च किया जा सके।
आए दिन प्रदेश की वित्तीय स्थिति का रोना रोने वाली सरकार इन ज्वलंत मुद्दों पर क्यों नहीं जागती, हो सकता है इसमें सरकार को कुछ अलग दृष्टिकोण हो किन्तु जनहित की समस्या पर सरकार को सबसे पहले सोचना चाहिए। बरसात में देहरादून की सड़कों का आलम यह रहता कि आप जिस भी सड़क पर चलें जाएं वहां आपको टूटी-फूटी और गढ्ढे युक्त सड़कंे ही नजर आती हैं। तो क्या इन सड़कों के लिए लोक निर्माण विभाग जिम्मेदार नहीं है। इन गढ्ढेदार सड़को का सबसे बड़ा दुष्परिणाम दुर्घटना के रूप में सामने आता है जो अधिक चिंताजनक है।
ब्रह्मकमल