नई राह की ओर जम्मू कश्मीर

नई राह की ओर जम्मू कश्मीर


केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा कश्मीर के मामले पर अपने घोषणा पत्र में किए गये वायदे को 6 अगस्त को अमलीजामा पहनाया गया। केन्द्र सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर में अब तक लागू अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35-ए के तहत प्रद्धत आधिकारों को समाप्त कर दिया गया है। ये दोनों अनुच्छेद जम्मू और कश्मीर को विशेष अधिकार एवं नागरिकता के अधिकारों से सम्बन्धित थे। इन्हीं अधिकारों के तहत जम्मू कश्मीर के लिए भारतीय संविधान के अतिरिक्त एक अलग संविधान की व्यवस्था भी वहां की विधान सभा में लागू थी। भारत सरकार द्वारा प्रतिवर्ष हजारों करोड़ रूपये अनुदान के रूप में जम्मू कश्मीर को दिया जाता था, जिसका कि विकास के कार्यों में योगदान न के बराबर ही होता था। इसी पहलु को ध्यान में रखकर भारत सरकार ने यह निर्णय लिया। 
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के लिए सरकार ने राज्य पुनर्गठन विधेयक भी पेश किया जिसे बाद में पास कराया गया। जम्मू-कश्मीर की स्थिति दिल्ली और पुदुच्चेरि जैसे केंद्र शासित प्रदेश वाली होगी, यानी यहां विधानसभा रहेगी। जबकि लद्दाख की स्थिति चंडीगढ़ जैसी होगी, जहां विधानसभा नहीं होगी। सरकार का कहना है कि उसने यह कदम इसलिए उठाया क्योंकि अनुच्छेद 370 के रहते राज्य का पुनर्गठन नहीं किया जा सकता था। इसकी मौजूदगी केंद्र सरकार के हाथ बांध देती थी और वह राज्य की बेहतरी के लिए अहम फैसले नहीं कर पाती थी।
अनुच्छेद 370 शुरू से ही राष्ट्रीय बहस का मुद्दा रहा है। देश का एक बड़ा वर्ग सरकार के इस फैसले से यहां अति प्रसन्न है वहीं 1990 में घाटी से निष्कासित लगभग 3 लाख कश्मीरी पंडितों के लिए यह फैसला अत्यन्त सुकूनदायक रहा। इन लोगों में अब अपने वतन वापसी की नई उम्मीद जगी है। वहीं दूसरी ओर इस पर राजनीति भी गरमायी हुई है। निश्चित रूप से इस फैसले के दूरगामी परिणाम जो कुछ भी आयेगें, लेकिन कश्मीर के मुद्दे पर जिस तरह से केन्द्र सरकार ने पाकिस्तान को वैश्विक मंच पर भी अलग-थलग कर दिया है उससे भारत का पक्ष और मजबूत हुआ है। 
 देश का एक तबका इसे जम्मू-कश्मीर के लोगों को भारत से जोड़ने वाली कड़ी मानता रहा है। लिहाजा उसकी मान्यता रही है कि इसमें कोई बुनियादी छेड़छाड़ कश्मीरी जनता की भावनाओं के अलावा भारत की मूल संवैधानिक प्रस्थापनाओं के भी खिलाफ जाएगी। जबकि दूसरी राय यह रही है कि इसके तहत मिलने वाले अधिकार और व्यवस्थाएं भारत की एकात्मकता के खिलाफ हैं और इनमें ज्यादातर दशकों पहले बेअसर हो चुकी हैं। 
अलगाववादी ताकतें इसे मुद्दा बनाकर अपने भारत विरोधी अभियान को चरम पर ले जाने का प्रयास कर सकती हैं। उनसे निपटने के लिए सुरक्षा तंत्र को मुस्तैद रहना होगा। इसे किसी की जीत या हार के रूप में प्रचारित करना ठीक नहीं है क्योंकि इससे बाकी देश में भी तनाव पैदा हो सकता है। यह वक्त कश्मीरियों से सघन संवाद में जाने का है। 


ब्रह्मकमल